परमात्मा को कैसे प्राप्त करें





 परमात्मा को कैसे प्राप्त करें, हम लोग परमात्मा की प्राप्ति के लिए बहुत जगह जाते हैं लेकिन फिर भी हमें परमात्मा नहीं मिलता | तो फिर हमें परमात्मा कहां मिलेगा और परमात्मा से मिलने का तरीका क्या है | इस बात को हमें कहानी के जरिए समझने की कोशिश करते हैं |

एक बार एक महात्मा जी एक गांव में से गुजर रहे थे । गांव वालों ने महात्मा जी को सादर रोक कर एक सवाल पूछा । सवाल यह था कि परमात्मा के राज्य में कौनसे लोग प्रवेश पा सकेंगे ? महात्मा जी ने तुरंत एक छोटे बच्चे को उठाया और कहा, "जिनके हृदय इस बच्चे की भांति होंगे, वही परमात्मा के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे" ।
संत महापुरुषों के अनुसार, ज्यों ज्यों हमारे भीतर अहंकार पैर जमाने लगता है; त्यों त्यों ही हमारा बचपन वाला कोमल, निर्मल और निश्चल हृदय कठोर होने लगता है । हमें लगने लगता है कि मैं कुछ हो गया हूं । धनी घर में पैदा हो कर सोचते हैं कि मैं धनी हूं । बड़े पद वाले घर में पैदा होकर सोचते हैं कि मैं तो कुछ खास हूं । ज्यादा शिक्षा पाकर हम सोचते हैं कि मैं सबसे विशिष्ट हो गया । बाकी बातें छोड़िए आप, व्यक्ति अच्छे कपड़े पहन कर ही अपनी चाल का चलन बदल लेता है । उपलब्धियां हासिल करके हम सोचते हैं कि मैं कुछ हूं ।
ऐसा सोच सोच कर ही हमारे हृदय कठोर होते चले जाते हैं । जबकि ध्यान पूर्वक सोचने वाली तो बात ही कुछ और है । सोचना तो यह है कि वास्तव में मनुष्य की शक्ति क्या है व समर्था क्या है ? हमें पता तो इतना भी नहीं कि हम पैदा क्यों हुए हैं ? हमें यह भी पता नहीं कि हम मरेंगे किस लिए ? यह भी पता नहीं हमे कि जो श्वास बाहर गई है, वह भीतर आएगी भी या नहीं ?
अगर अपनी एक श्वास पर भी हमारा कोई वश नहीं है तो फिर कैसा मैं कुछ हूं ? कुछ भी तो नहीं हूं मैं जैसे एक सूखा पता हवा में उड़ता जाए, ठीक वैसी ही स्थिति हमारी है । लेकिन महात्मा हमें सचेत कर रहे हैं कि तुम वास्तव में बहुत कुछ हो । तुम परमपिता परमात्मा का अंश हो । तुम प्रेम, मैत्री, समर्पण, सहयोग से ओत प्रोत जीवात्मा हो । तुम कभी अपने वास्तव को पहचान कर तो देखो !
हम 24 घंटे बाहर देखते हैं । जब स्वयं को देखने का मौका आता है, तब हम सो जाते हैं । भीतर देखना हो ही नहीं पाता । हमें बस दो ही काम हैं; या तो बेकार देखते हैं या फिर देखते ही नहीं । क्योंकि दिन में बाहर देख कर रात में सो जाते हैं । स्वपन देखना भी बाहर देखना ही होता है । क्योंकि हमारे सपनों में भी बाहर की दुनिया ही होती है ।
महात्मा फरमाते हैं कि 24 घंटे में एक बार ही थोड़ी देर होशपूर्वक आंख बंद करके भीतर देखें । सिर्फ देखने की कोशिश में आंख को बंद करें । अंधेरा दिखे तो अंधेरे को ही देखो । कोई स्वपन दिखाई पड़े तो उसे देखो । भीतर जो भी होता हो, इंद्रियों को बंद करके उसे ध्यान पूर्वक देखने का प्रयास करो ।
पहले आंख से शुरु करें, क्योंकि यही आप की महत्वपूर्ण इंद्री है । फिर अपने भीतर में जो भी सुनाई पड़े, उसे सुनने की कोशिश करें । फिर ध्यान मग्न होकर सूंघने की कोशिश भी करें । आपकी इंद्रियां जो जो भी बाहर करती हैं, वही अपने भीतर करने की कोशिश करें । ऐसा करने पर तुम दंग ही रह जाओगे , क्योंकि भीतर तुम्हारे चमत्कार हो उठेगा ।
पहले तुम पाओगे कि कुछ तो है । फिर तुम पाओगे कि बहुत कुछ है यहां तो । क्योंकि भीतर के अपने ही नाद हैं और अपनी ही ध्वनियां हैं । भीतर के अपने ही रंग हैं, अपने ही स्वाद और सुगंध है । जिस दिन आपको भीतर के रंग दिखाई पड़ने लगेंगे, उस दिन बाहर की दुनिया के सब रंग फीके पड़ जाएंगे । फिर तुम्हारी बाहर जाने की इच्छा बंद होने लगेगी !
तब संतोष और तृप्ति का भंडार मिलना भी शुरू हो जाएगा । फिर बाहर के सब संगीत तुम्हें शोरगुल मालूम पड़ने लगेंगे । भीतर की सुगंध का पता चलते ही  बाजारों के सारे परफ्यूम बेकार हो जाएंगे । जिस दिन भीतर के सौंदर्य का बोध होगा, उस दिन बाहर भी सौंदर्य ही सौंदर्य हो जाएगा । फिर हर व्यक्ति तुम्हें अतिसुंदर नजर आने लगेगा।
इसके लिए आपको महात्माओं की आज्ञानुसार सुमिरन ध्यान में उतरना होगा !

तो चलो दोस्तों हम भी अगर परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने अंदर उसको प्रेम प्यार से ढूंढने की कोशिश करते हैं | अगर हम परमात्मा को प्रेम प्यार से अपने अंदर ढूंढने की कोशिश करेंगे हमें जरूर मिलेगा |

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