परमात्मा को देखने वाली नजर

 

  एक दिन भाई मरदाना जी ने गुरु नानक देव जी से कहा कि गुरुजी आप कहते हो परमात्मा कण कण में है, लेकिन फिर भी वह परमात्मा हमें दिखाई क्यों नहीं देता। बाबा नानक ने मर्दाना से कहा के जब हम कोई दूर की चीज को देखते हैं तो हमें पूरा ध्यान उस लगाना पड़ता है। जब हमारा ध्यान अच्छी तरह लग जाता है फिर हम उस चीज को देख पाते हैं।

जब हम दुनिया की सभी चीजों की तरफ से ध्यान हटाकर परमात्मा को देखने की कोशिश करेंगे, तो ही हम परमात्मा को देख पाएंगे। गुरुजी की बात सुनकर मरदाना ने कहा, गुरुजी मैं ध्यान लगाने की बहुत कोशिश करता हूं लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली। आप तो सब जानते हो। आप मेरे ऊपर कृपा करो के मैं अपने अंदर उस परमात्मा को देख सकूं।

गुरुजी ने भाई मरदाना से कहा, भाई मरदाना तुमने ऐसे लोग देखे हैं जो सिर्फ अपने अनुभव से ही खरबूजे को देख कर ही बता देते हैं कि वह मीठा है या फीका। मरदाना आपके अंदर भी वह ताकत है, आप ध्यान लगाने की कोशिश करो आपको भी अपने अंदर परमात्मा जरूर  नजर आएगा। भाई मरदाना बोला गुरु जी आप तो जानते हो मैं रोज परमात्मा के भजन गाता हूं, रवाब भी बजाता हूं उसके बाद भी मुझे ईश्वर नजर नहीं आ रहा।

बाबा नानक ने कहा भाई मरदाना आप शब्द गाते हो, रवाब  भी बजाते हो, सरगम भी गाते हो। आपके सामने कोई शब्द गाता है या रवाब बजाता है तो आप अपने अनुभव से बता सकते हो कि वह कौन सी सरगम, कौन सा शब्द गा रहा है। भाई मरदाना बोला गुरु जी इसमें कौन सी बड़ी बात है। यह तो मेरा अनुभव है और मैं अपने अनुभव के अनुसार ही बता सकता हूं। बाबा नानक बोले के ठीक है यह आपका अनुभव है । आप अपने अनुभव के अनुसार ही सब बता सकते हो। इसी तरह अगर तुम परमात्मा का नाम प्रेम भाव से लोगे तो वह परमात्मा भी आपके चेतन में बैठ जाएगा। लेकिन गुरु जी भाई मरदाना बोले संगीत तो मेरे चेतन में बैठ चुका है, पर ईश्वर नहीं । वह कैसे मेरे चेतन में आएगा ?
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बाबा नानक बोले अब आप सो जाओ, सुबह आपको इसका जवाब मिल जाएगा। अगले दिन सुबह बाबा नानक ने एक पत्थर मर्दाना को दिया और कहां, इस पत्थर को नजदीक वाले गांव में जाकर बेचकर  कुछ खाने का इंतजाम करो। गांव में एक सुनार था जिसका नाम सालास राय था उसके नौकर ने उससे पूछा, मालिक आपके पास अनमोल हीरे पत्थर मोती हैं। आप उनको देखते ही उनकी कीमत का अंदाजा कैसे लगा लेते हो ? मैं भी आपके साथ हैं रोज बैठता हूं लेकिन मुझे आज तक भी यह अनुभव नहीं हुआ कि आप यह कैसे कर लेते हो। सालास राय  बोला इसमें कौन सी बड़ी बात है, यह सिर्फ अनुभव की बात है, जिस दिन तुम्हें भी अनुभव हो जाएगा, तुम भी इनकी कीमत देख कर ही बता सकोगे। कौन सा पत्थर कीमती है, कौन सा जेवर अनमोल है। मालिक कोई ऐसा तरीका है जो मैं सीख सकूं के कौन सा जेवर असली है, और कौन सा नकली है। मालिक ने कहा यह कौन सी बड़ी बात है, यह तुम्हें भी अपना ध्यान अच्छी तरह इसके ऊपर लगाना पड़ेगा,, जितना ज्यादा ध्यान तुम इसके ऊपर लगाओगे उतनी जल्दी ही सीख जाओगे ।

इतने में दूसरा नौकर आया और बोला मालिक एक आदमी आया है जो थोड़ा जल्दी में है। वह आपको मिलना चाहता है। मालिक बोला चलो उससे मिलते हैं। उसने जाकर पूछा कि आप क्या खरीदना चाहते हो ? यह आदमी बोला मैं खरीदने नहीं कुछ बेचने आया हूं । मैं इसको बेच कर अपने और अपने गुरु जी के लिए भोजन का प्रबंध करना है। मालिक बोला दिखाओ कि आप क्या बेचना चाहते हो। भाई मरदाना ने जैसे ही गुरुजी का दिया हुआ पत्थर सालोंस राय को दिखाया, वह हैरान हो गया और बोला हे ईश्वर आपका धन्यवाद। यह कहकर उसने सो रुपए निकालकर भाई मरदाना को दिए और कहा यह पत्थर भी आप वापस ले जाओ। भाई मरदाना बोले मैं यह पत्थर वापस कैसे ले जा सकता हूं क्योंकि आपने तो इसके बदले मुझे सो  रुपए दिए हैं, सालास राय बोला, नहीं नहीं यह इस पत्थर की कीमत नहीं है। मैंने पैसे इसलिए दिए हैं कि आपने मुझे इस कीमती पत्थर के दर्शन करवाए हैं। मेरे गुरु जी ने मुझे यह सिखाया है के अगर आपको कोई ऐसी चीज दिखाएं जो अनमोल हो, जिसकी कोई कीमत ना हो, उसको देखने के भी पैसे देने चाहिए। भाई मरदाना बोला जब मुझे गुरु नानक देव जी ने यह पत्थर दिया था तो मैंने यह सोचा था के किसी अमीर आदमी को मैं पत्थर दे दूंगा और बदले में वह हमारे खाने का प्रबंध कर देगा।


जब मैं इस पत्थर को बेचने गांव में आया तो सबसे पहले मुझे एक सब्जी वाला मिला, मैंने उससे कहा के इस पत्थर के बदले मुझे आप क्या दे सकते हो। उसने बदले में मुझे थोड़ी सी सब्जी देनी चाहि। फिर मैं एक मिठाई वाले के पास गया, उसने भी यही कहा मैं इस पत्थर के बदले आपको थोड़ी सी मिठाई दे सकता हूं। इस तरह सब ने अपने अपने हिसाब से इस पत्थर की कीमत लगाई।

भाई मरदाना पत्थर वापस लेकर बाबा नानक के पास पहुंचे, भाई मरदाना जी ने वह पत्थर और पैसे निकालकर बाबा नानक जी के सामने रख दिए और कहां गुरु जी मैं जिसको एक मामूली पत्थर समझ रहा था वह तो एक कीमती जेवर निकला। भाई मरदाना जी ने सारा वाक्य बाबा नानक जी को बताया। बाबा नानक जी ने कहा भाई मरदाना यह सब देखने वाले की नजर में है। तुमने बहुत सारे लोगों को यह पत्थर दिखाया लेकिन इस पत्थर की कीमत सिर्फ उस सुनार को पता थी।

इसी तरह भगवान को देखने वाली भी कोई कोई आंख होती है। इसी तरह अगर हम भी परमात्मा को अनुभव करने वाली दृष्टि पा लेंगे, तो हम परमात्मा को जरूर देख सकेंगे।

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