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दुनीचंद के पिता क्यों बने भेड़िया



 श्री गुरु नानक देव जी के तेज की गाथा सभी और फैल चुकी थी, और सभी और उनके द्वारा किए गए मानव कल्याण के कार्यो का गुणगान हो रहा था। दुनीचंद नामक व्यक्ति जो लाहौर का रहने वाला था। वह एक अमीर इंसान का पुत्र था, और उसके पिताजी की मृत्यु हो चुकी थी। उसके बंगले पर सात झंडे लगे हुए थे। हर एक झंडा उसकी संपत्ति को दर्शाता था। वह बहुत ही ज्यादा अमीर व्यक्ति था।

श्री गुरु नानक देव जी उसके शहर में पधारे। गुरु नानक देव जी ने नदी के किनारे अपना डेरा जमाया। वहां गुरु नानक देव जी लोगों को शिक्षाएं देते थे। गांव के सभी लोग आ रहे थे और गुरु जी को नमस्कार कर कर अपना स्थान ग्रहण कर रहे थे। भाई दुनीचंद भी वहां पधारें। वह गुरुजी के नूरानी दर्शन कर के  मंत्रमुग्ध हो गया और उसने मन ही मन सोचा। जैसा मैंने नानक जी के बारे में सुना था उस से बढ़कर पाया है। आज तक मैंने बहुत साधु संत देखे हैं लेकिन जैसा आनंद मैंने गुरु जी के दर्शन करके पाया है वैसा पहले कभी नहीं मिला।

वह वहीं पर बैठ गया और गुरु जी के उपदेश सुनने लगा। दुनीचंद बहुत ही धनी व्यापारी था परंतु वह ना ही कंजूस था वह ना ही लोगों को अपने फायदे के लिए कष्ट देता था।  वह सिर्फ साधारण स्वभाव का व्यापारी था, परंतु उसका मन हमेशा कारोबार के नफे नुकसान में लगा रहता था।

 जब गुरु जी का सत्संग समाप्त हो गया तो उसने गुरु जी को प्रणाम किया और गुरुजी ने उसे अपना आशीर्वाद दिया। उसने बाबा नानक को कहा कि गुरु जी कल मेरे पिताजी की पुण्यतिथि है। उस के उपलक्ष में कल पूजा पाठ का आयोजन किया है। कल मेरे यहां दूर-दूर से साधु महात्मा आ रहे हैं। सबके लिए भोजन का प्रबंध भी किया है, कृपया आप भी मेरे यहां पधारे। और अपना आशीर्वाद हमें भी दे।
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बाबा नानक ने पूछा, श्रीमान आप अपना परिचय दें। गुरु जी मैं तो आपका सेवक हूं। इसी शहर में अपना कारोबार चलाता हूं । कारोबारी हमेशा अपने काम के बारे में ही सोचता रहता है। वैसा ही मैं भी हूं। मैंने आपके बारे में बहुत सुना है इसलिए मैं चाहता हूं कि आप हमारे यहां पधारे। बाबा नानक ने कहा कि हम संत हैं और तुम अमीर आदमी हो। हम लोग जंगलों में रहते हैं और तुम अपने आलीशान घर में। दुनीचंद बोला गुरु जी मैं तो एक सांप की तरह हूं, जो अपनी दौलत के ऊपर कुंडली मार कर बैठा हूं । लेकिन गुरु जी आप तो सभी का उद्धार करते हो।

बाबा नानक बोले, ठीक है दुनीचंद, मैं तुम्हारे घर आऊंगा। बहुत-बहुत मेहरबानी गुरुजी, दुनीचंद बोला। गुरुजी कल मैं आपको लेने खुद आऊंगा। बाबा नानक बोले नहीं दुनीचंद, तुम्हें आने की या किसी को भेजने की जरूरत नहीं है मैं खुद ही आ जाऊंगा। गुरुजी की बात सुनकर दुनीचंद बहुत खुश हुआ।

अगले दिन गुरूजी दुनीचंद के घर पहुंचे, दुनीचंद के घर में सारे प्रबंध हो चुके थे। पूरे शहर के ब्राह्मण पुण्यतिथि के उपलक्ष में आए थे।ब्राह्मणों के अलावा साधु संत भी पधारे थे ब्राह्मण पुण्यतिथि की क्रिया करवा रहे थे। दुनीचंद के दोस्त रिश्तेदार व अन्य कारोबारी मित्र भी इस भव्य समारोह में शामिल हुए।परंतु इन सब घटना के अलावा एक और घटना घटी थी। श्री गुरु नानक देव जी जो अपने आप को इस तरह के समारोह और दिखावे से अपने आप को दूर रखते थे। वह भी वहां पधारे थे।सभी लोग वहां भोजन करने व दान दक्षिणा के लालच से आए थे, परंतु गुरुजी वहां किसी भी तरह के मोह की वजह से नहीं पधारे थे। अपितु उनके वहां आने का कोई तो राज था।

खाने का समय हो गया था पाठ पूजा खत्म हो चुकी थी। दुनीचंद ने गुरुजी से भोजन करने के लिए कहा, गुरु जी बोले मैं बाद में करूंगा पहले तुम और सभी को भोजन करवाओ। सभी ब्राह्मण साधु संत भोजन  कर के अपनी दक्षिणा लेकर वहां से चले गए।

अब दुनीचंद उस कक्ष में आ गया जहां उसने गुरूजी को बैठाया था, उसने बड़ी नम्रता से पूछा गुरु जी सभी लोगों ने भोजन कर लिया है अब कृपया आप भी पधारें और भोजन करें। मैं अपने हाथों से आपको भोजन परोसना चाहता हूं। कृपया यह सेवा का मौका मुझे दे। गुरुजी मुस्कुराए और दुनीचंद से बोले आज तुम्हारे घर में क्या समारोह है और क्यों किया जा रहा ? गुरु जी आज मेरे पिताजी की पुण्यतिथि है, बाबा नानक बोले बस इसी वजह से, दुनीचंद बोला ब्राह्मणों ने पाठ पूजा भी की है। बाबा नानक बोले दुनीचंद यह सब करने का क्या उद्देश्य है ? दुनीचंद बोला सभी ब्राह्मणों ने भोजन किया है, पूजा पाठ किया है और आप जैसे महान संत भी यहां पधारे हैं। मुझे पूरा विश्वास है मेरी पूजा सफल हो गई है। मेरे पिताजी तृप्त हो गए होंगे।

गुरुजी ने कहा सुनो दुलीचंद जिस उद्देश्य के लिए तुमने यह सब किया था वह पूरा नहीं हुआ है। सभी ब्राह्मणों का पेट जरूर भर गया है लेकिन तुम्हारे पिताजी का नहीं। मृत्यु के पश्चात उन्होंने भेड़िया बन कर जन्म लिया है, और आज वह भेड़िया तीन दिन से भूखा है। दुनीचंद एकदम घबरा गया और बोला, गुरु जी यह आप क्या कह रहे हो ? इतना सब कुछ करने के बाद भी मेरे पिताजी भूखे हैं और उन्होंने एक भेड़िया बन कर जन्म लिया है। बाबा नानक बोले तुमने सही सुना दुनीचंद। दुनीचंद ने हाथ जोड़कर गुरु जी से प्रार्थना की कि गुरुजी कृपया आप मुझे बताएं मेरे पिताजी इस समय कहां है। और वह क्यों भूखे हैं, क्या मैं उनसे मिल सकता हूं।

उत्तर दिशा में नदी किनारे जंगल की ओर जाओ वहां पर तुम देखोगे एक भेड़िया भूखा लेटा हुआ है, तुम डरना मत, वहां तुम अपने पिताजी से मिलोगे और वह तुम्हें खुद ही बताएंगे कि भोजन उन तक पहुंचा है या नहीं? दुनीचंद तुरंत उस स्थान की ओर चल दिया। वह उस स्थान पर पहुंच गया था जहां गुरुजी ने उसे जाने को कहा था।वहीं पर एक भूखा भेड़िया लेटा हुआ था। दुनीचंद ने  जैसे ही आगे कदम बढ़ाया तो उस भेड़िए के शरीर से धुआं उठने लगा। थोड़ी देर में उस धुए ने उसके पिता की आकृति ले ली। दुनीचंद ने अपने पिता को प्रणाम किया और पूछा, पिता जी मैंने आप की पुण्यतिथि पर सभी साधु संतों को बुलाया और उन को भोजन कराया। क्या आपकी तृप्ति हो गई है और आप को भोजन मिल गया है ? उसके पिताजी बोले नहीं दुनीचंद मुझे भोजन नहीं मिला है। दुनीचंद हैरान होकर बोला ऐसा क्यों मैंने तो सभी साधु-संतों को भोजन कराया था और उन्होंने कहा था कि आपकी संतुष्टि हो गई है।

दुलीचंद के पिता जी बोले, पुत्र यह सब एक व्यापार बन चुका है, कहीं प्यार नहीं है। पुत्र जो कुछ तुमने किया वह सिर्फ एक दिखावा मात्र है। मेरी तृप्ति नहीं हुई है, जो साधु संत आए थे उनका पेट भर गया और उनको दान दक्षिणा मिल गई। इस वजह से उनकी तृप्ति तो जरूर हो गई है लेकिन मेरी नहीं।

दुलीचंद बोला पिताजी आप की यह दशा कैसे हुई, बेटा मेरा बचपन से ही परमात्मा की तरफ बिल्कुल भी लगाव नहीं रहा। ना मैंने कभी पूजा की, ना मैंने कभी पाठ किया। मैं अपने पूरे जीवन में सिर्फ धन कमाने की सोचता रहा। मैंने कभी ईश्वर का नाम नहीं लिया और ना ही मुझे कोई सच्चा गुरु मिला। जिन लोगों को मैं सच्चा ज्ञानी और महात्मा समझता था, उन लोगों ने मुझे पाखंड और बाहरी क्रियाओं में उलझाए  रखा। मेरे से पूजा करवाते रहें और अपना फायदा उठाते रहे और मुझे सब कुछ करके भी कुछ ना मिला। मेरे किए हुए कर्मों की वजह से ही मुझे भेड़िए की योनि में पैदा होना पड़ा। आज जिस संत को तुमने बुलाया है, कौन से संत! दुनीचंद हैरान होकर बोला ? श्री गुरु नानक देव जी, उनकी वजह से मुझे मोक्ष मिल गया है और तुम्हारा जीवन भी सफल हो गया है। दुनीचंद को सच्चाई का रास्ता दिखाकर बाबा नानक अपनी अगली यात्रा पर निकल पड़े।

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