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श्री गुरु तेग बहादुर जी और जादूगरनी

श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की सुंदर साखी
 

भाई मैहर को आशीर्वाद देने के पश्चात गुरु श्री तेग बहादुर जी कुरुक्षेत्र से होते हुए बदरपुर इत्यादि स्थानों से होकर आगे बढ़ते हुए बड़ा मानकपुर पहुंचे। वहां पर वैष्णो माता का भगत एक साधु रहता था और उसका नाम मलूक चंद था। किसी ने उसको बताया कि साधु महाराज क्या आप जानते हैं ? गुरु नानक देव जी के नौवें स्वरूप श्री गुरु तेग बहादुर जी गांव में पधारे है। सभी उनके दर्शनों के लिए जा रहे हैं। साधु बोला यह तो बहुत अच्छी बात है मैं भी उनसे मिलने जाऊंगा।

अभी वह गुरु साहिब जी के दर्शन को जाते उससे पहले किसी ने उनको बोला, अरे मलूक गुरु साहिब तो शस्त्रधारी हैं। वह तो शिकार आदि भी खेलते हैं और आप ठहरे कठोर अहिंसावादी, फिर भी आप उनसे मिलने जा रहे हैं। यह बात सुनकर मलूक चंद ने गुरु जी से मिलने की इच्छा त्याग दी। वह सोचने लगा कि मैं पूरी जिंदगी अहिंसा के मार्ग पर चला और अहिंसा ही मेरे लिए सबसे बड़ा धर्म है। मैं अपनी विचारधारा के खिलाफ कैसे उस व्यक्ति से मिलू  जो अस्त्र-शस्त्रधारी है। यह बातें सोच कर उसने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से मिलने का इरादा छोड़ दिया।

साधु रोज सुबह उठकर सबसे पहले पूजा पाठ किया करता था। अगली सुबह उसने पूजा की थाली सजाई परंतु जैसे ही उसने अपने इष्ट देव को भोग लगाने के लिए थाली के ऊपर से कपड़ा हटाया, उस थाली में उसे मास नजर आया। मांस देखकर मलूक चंद विचलित हो गया और हैरानी में यह सोचने लगा की थाली में मांस कहां से आया। उसने तुरंत उसको फेंका और एक दूसरी थाली सजाकर अपने इष्ट देव की पूजा करने के लिए वापस गया परंतु जैसे ही उसने फिर से कपड़ा हटाया उसे फिर प्रसाद की जगह मास नजर आया।

मलूक चंद को कुछ भी समझ नहीं आया, वह दुखी होकर ध्यान में बैठ गया। एकदम उसे अपने इष्ट देव की आवाज सुनाई दी, मलूक तेरी भक्ति संपूर्ण हुई है। क्या तुम नहीं जानते जितने भी अवतारी पुरुष हुए हैं सब शस्त्रधारी थे और मानव उद्धार के लिए अपनी लीलाओं से दुष्टों के अंत के लिए शस्त्रों का प्रयोग करते थे। यह बात सुनकर मलूक चंद ने क्षमा मांगी और गुरुदेव के दर्शन करके उसने गुरु जी से आशीर्वाद लिया।

इसके पश्चात गुरु श्री तेग बहादुर जी मानव समाज के कल्याण हेतु प्रचार दौरा करते हुए हरिद्वार पहुंचे। उन्होंने अपने काफिले का शिविर हरिद्वार के निकट कनखल में लगाया। जैसे ही लोगों को पता चला कि गुरु नानक देव जी नौवें उत्तराधिकारी वहां पधारे हैं तो लोग उनके दर्शन करने के लिए पहुंचने लग गए।

गुरुजी की ख्याति सुनकर एक सन्यासी गुरु जी से मिलने चला आया। वह गुरु जी से मिला और अपने दिल की गाथा उनको सुनाते हुए बोला, गुरु जी मैंने सुना है बाबा नानक परिवार में में रहते हुए पूर्ण सत्य की प्राप्ति के लिए सब का मार्गदर्शन करते थे। बस में उसी ज्ञान की प्राप्ति के लिए भटक रहा हूं। मैंने जप तप पूजा योग साधना सब कुछ तो किया परंतु मैं थक चुका हूं। मैं सभी तरह के तीर्थ स्थानों पर गया लेकिन मेरा मन अभी तक काबू में नहीं आया। गुरु जी कृपया मुझे ऐसा ज्ञान दें कि मेरा मन पूरी तरह से प्रभु चरणों में जुड़ जाए।

गुरुदेव ने उसकी समस्याओं का समाधान करते हुए कहा, उस ईश्वर के लिए जंगलों में भटकने की जरूरत नहीं है ईश्वर तो सर्वव्यापक है, जर्रे जर्रे में है कन कन में है। जैसे फूल में सुगंध तथा शीशे में परछाई रहती है। उस भगवान को अपने हृदय में ही खोजें, इसके पश्चात गुरु एक बहादुर साहिब जी ने जो शब्द कहे, वह शब्द श्री गुरु ग्रंथ साहिब 684 में दर्ज है। उन शब्दों का यह अर्थ है कि हे भाई परमात्मा को ढूंढने के लिए जंगलों में क्यों जाता है। मानव की माया की प्रभाव की वजह से वह दूर है परंतु असल में तो वह हर चीज में बसा है। हे भाई जैसे फूल में सुगंध बस्ती हैं, जैसे शीशे में शीशा देखने वाले का अक्स बसता है वैसे ही परमात्मा एकरस सबके अंदर बसता है। इसी कारण उसे अपने अंदर ही तलाश करें। हे भाई, गुरु के आत्मिक जीवन का उपदेश यही बताता है कि परमात्मा हर जगह है। हे दास नानक अपना आत्मिक जीवन परखे बिना मन पर पड़ा हुआ भटकन का जाल दूर नहीं हो सकता और तब तक उस परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। सन्यासी को गुरु जी की बातों से संतुष्टि हो गई ।

इसके पश्चात श्री गुरु तेग बहादुर जी से राजाराम सिंह ने असम के राजा जगतवध को खत्म करने के लिए अपने साथ चलने का आग्रह किया। श्री गुरु तेग बहादुर जी वहां  पहुंचे तो वहां पर काला जादू और तंत्र विद्या का बोलबाला था। सबसे पहले गुरुजी ने असम की सिख संगत जो गुरु नानक देव जी के समय बनी थी उन्हें वह स्थान दिखाया जहां पर श्री गुरु नानक देव जी विराजे थे।

जब राजा जगतवध सिंह को पता चला कि एक सिद्ध पुरुष जो श्री गुरु नानक देव जी के नौमें उत्तराधिकारी राजा राम सिंह  के साथ पहुंचे हैं तो उन्होंने सिद्ध पुरुष का मुकाबला तंत्र मंत्र से करने के लिए एक जादूगरनी को भेजा। जादूगरनी ने ध्यान में मग्न श्री गुरु तेग बहादुर सिंह जी के ऊपर एक बहुत बड़ी पत्थर की शिला को मिसाइल की तरह फेंका। परंतु वह पत्थर की शिला गुरु साहिब का कुछ ना बिगाड़ सकी। इसके पश्चात उसने गुरु जी के ऊपर एक बड़े पीपल के पेड़ को उखाड़ कर उन पर वार किया लेकिन गुरु जी ने उस पेड़ को हवा में ही रोक दिया। जब जादूगरनी के दोनों वार असफल हो गए तो उसे समझ में आया कि श्री गुरु तेग बहादुर जी बहुत बड़े सिद्ध पुरुष है। जादूगरनी ने अपने किए हुए कर्मों की गुरुजी से क्षमा मांगी।

गुरुजी ने दोनों राजाओं को शांति के साथ समझौता करने के लिए कहा। जिस स्थान की यह घटना है वहां आज गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब है और यह स्थान असम के जिला धुबरी में है और जिस स्थान पर गुरु नानक देव जी बैठे थे, उस स्थान को धड़ा साहिब कहते हैं। वह पत्थर की शिला जो जादूगरनी ने गुरु तेग बहादुर साहिब के ऊपर फेंकी थी वह आज भी वहां धंसी हुई है। और जिस स्थान पर गुरु श्री तेग बहादुर साहिब जी ने ध्यान किया था।उस स्थान पर वह पेड़ लगा हुआ है जिसे गुरु साहिब पर जादूगरनी ने फेंका था।

अब बहुत से ज्ञानी यह भी कहेंगे कि जब गुरु साहिब में इतनी शक्ति थी तो उन्होंने हंसते-हंसते मुगलों का अत्याचार क्यों सहन किया। अब चाहे आप किसी को संत कहे या किसी का अवतार इनका धरती पर आना और धरती से जाना पहले से ही तय होता है और वह इस बात को पहले से ही जानते थे के अब वह घड़ी आ गई है जब उन्होंने इस शरीर रूपी चोले को छोड़ना है। अगर ऐसा नहीं होता चाहे जीसस क्राइस्ट हो चाहे श्रीराम हो चाहे श्री गुरु नानक देव जी हो इन सब को कोई भी शक्ति नुकसान नहीं पहुंचा सकती थी।

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