श्री कृष्ण ने क्यों नहीं बचाया अभिमन्यु को

सुख हो या दुख दोनों में ही इंसान की समझ बूझ चली जाती है, इसका उदाहरण देते हुए संत मसकीन जी कथा सुनाते हैं। महाभारत का युद्ध चल रहा था, कौरवों ने चक्रव्यूह रचकर अभिमन्यु का वध कर दिया।यह देख अर्जुन अत्यंत ही शौक में चले गए और दुखी हुए उन्होंने अपने पुत्र अभिमन्यु के शव को उठाया और श्री कृष्ण के सामने रख दिया और कहा, हे केशव कौरवों ने मेरा पुत्र अभिमन्यु छल से मारा है। उसके बिना मैं नहीं जी सकता। अभिमन्यु मेरा काबिल पुत्र था। मेरे जीवन का सहारा था मेरा सब कुछ खो गया है । हे केशव मेरी आपसे प्रार्थना है कि मेरे पुत्र को जीवित कर दो।

श्री कृष्ण ने सोचा की अर्जुन दुखी है  यह ज्ञान से प्रभावित नहीं होगा।यानी समझाएं नहीं समझेगा।  इंसान चाहे बहुत सुखी हो या बहुत दुखी, दोनों ही व्यक्ति नहीं समझ सकते इसलिए ज्ञान लेने के लिए बीच की अवस्था चाहिए और अर्जुन इस समय बहुत दुखी है इसलिए यह नहीं समझेगा। जिस प्रकार सितार के  तार बहुत ढीले हो या बहुत कसे हूं,  दोनों ही अवस्था में संगीत नहीं बज सकता। उसी प्रकार बहुत दुखी है बहुत सुखी व्यक्ति समझाने पर नहीं समझ सकते। यह बात सोच कर श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा, अर्जुन मेरा सोने का कमंडल ले जाओ इसमें पानी लेकर आओ।यह सुनते ही अर्जुन ने सोचा शायद श्री कृष्ण जरूर कोई मंत्र पड़ेंगे और मेरा पुत्र जीवित हो जाएगा।

 मैं अभी पानी लेकर आता हूं यह सोचकर अर्जुन भागते हुए गए, और सरोवर से कमंडल में पानी भरकर श्री कृष्ण के सामने रख दिया और श्री कृष्ण के सामने हाथ जोड़कर बोले, प्रभु जैसा आपने कहा था मैंने वैसा ही किया है। अब मेरे पुत्र को जिंदा कर दो।

श्री कृष्ण बोले अर्जुन जाओ इस पानी को वापस उसी जगह  गिरा आओ, यह क्या बात हुई अभी तो पानी मंगवाया है और अब उसे गिराने को कह रहे हैं शायद इसकी जरूरत होगी। अर्जुन बोले मैं अभी जाता हूं, परंतु अर्जुन इतने दुखी थे कि उन्हें अभिमन्यु के जीवित होने के थोड़ी सी भी किरण एक बड़ा अवसर दिख रही थी।उसने तुरंत कमंडल उठाया और वापस जाकर सरोवर में दोबारा कमंडल से पानी गिरा दिया यानी कमंडल का पानी सरोवर में दोबारा मिल गया। वापस आकर खाली कमंडल श्री कृष्ण के सामने रखा और कहा, हे भगवान जैसा आपने कहा था मैंने वैसा ही किया है अब मेरे पुत्र  को जिंदा कर दो।

अर्जुन अब तुम ऐसा करो जो पानी तुम सरोवर में गिराकर आए हो अब उस पानी को दोबारा कमंडल में भर कर ले आओ। अर्जुन ने हैरान होते हुए श्री कृष्ण से कहा, हे केशव मेरे साथ ऐसा मजाक क्यों कर रहे हो जो पानी सरोवर में गिर कर उस में विलीन हो गया है उसको मैं कैसे ला सकता हूं।

हे अर्जुन मजाक तो तुमने  शुरू किया था। तुम छोटे से सरोवर में पानी मिलाकर आए हो और तुम उसे दोबारा नहीं ला सकते। परमात्मा एक विशाल सागर की तरह है और अभिमन्यु की आत्मा एक छोटी सी बूंद, और वह छोटी सी बूंद उस परमात्मा रूपी सागर में विलीन हो गई है तो मैं उसे दोबारा कैसे ला सकता हूं।

अर्जुन उसी समय श्रीकृष्ण के चरणों में गिर गए और बोले हे भगवन मुझे क्षमा करें। आप जो समझाना चाहते थे मुझे सब समझ में आ गया है। श्री कृष्ण बोले अर्जुन तुम्हें समझ नहीं आई बल्कि नजरों से धुंध का पर्दा हट गया है। दुख एक ऐसा पर्दा है जो आंखों को अंधा कर देता है। इसी तरह सुख भी एक ऐसा पर्दा है जो इंसान को अंधा कर देता है।

श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन, तुम महा ज्ञानी हो लेकिन फिर भी पुत्र के मोह में सब कुछ भूल गए, तुम यह भी भूल गए कि जो इंसान एक बार इस दुनिया से चला जाता है वह फिर कभी वापस नहीं लौटता। श्री कृष्ण की बातें सुनकर अर्जुन का दुख कम हो गया और वह जोड़कर बोला, केशव आपकी बातें सुनकर मेरा मन हल्का हो गया है। यह बात कह कर अर्जुन श्री कृष्ण को प्रणाम करके चला गया।

शिक्षा: हमें जीवन में कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि हम सब की मृत्यु निश्चित है। जिसने इस दुनिया में जन्म लिया है उसकी मृत्यु जरूर होगी इसलिए हमें कभी भी घबराना नहीं चाहिए बल्कि मौत का सामना करना चाहिए।

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