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अगले जन्म में हम पशु बनेंगे या इंसान


अरब यात्रा के दौरान श्री गुरु नानक देव जी मसद शरीफ  जा पहुंचे जहां हजरत अली की कब्र है। वहां उन्होंने लोगों को अपना आशीर्वाद दिया मशद से गुरु जी अब्दुल कादर जिलानी के प्रसिद्ध शहर बगदाद जा पहुंचे।जब गुरु जी वहां पहुंचे उस समय वहां पर खलीफा बगर और पीर अब्दुल रहमान का शासन था। गुरु जी ने अपना डेरा शहर के पूर्व खजूर के पेड़ों के घने जंगलों में कब्रिस्तान के पास बनाया सुबह के समय भाई मरदाना गुरबाणी गाने लगे।

भाई मरदाना की गुरबाणी वहीं पर खड़ा अब्दुल रहमान का चेला सुन रहा था वह तुरंत दस्तगीर के पास गया और बोला जनाब कुछ हिंदी फकीर कब्रिस्तान के पास आए हैं, वह कहते हैं कि अनगिनत दुनिया है। यहां तक कि वह संगीत बजा रहे हैं जो शरीयत के खिलाफ है। वह लोग मुझे काफिर लगते हैं।

यह सुनकर पीर अब्दुल रहमान यह सुनकर गुस्से से लाल हो गए। उसने सिपाहियों को हुकुम दिया कि मेरा घोड़ा निकालो आज मैं उन काफिरों को जिंदा दफन कर दूंगा। यह कहकर वह श्री गुरु नानक देव जी की ओर निकल गया। जब वह गुरुजी से कुछ दूरी पर था तो घोड़ा वहीं रुक गया, उसने घोड़े को मारा और आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन वह घोड़ा टस से मस नहीं हुआ।

जैसे ही अब्दुल रहमान ने आगे देखा तो उसे वह फकीर सो कदम की दूरी पर बैठे हुए नजर आए। गुरुजी के चेहरे पर सूरज की रोशनी जैसी आभा थी। वह आभा इतनी तेज थी कि अब्दुल रहमान अपनी आंखें भी नहीं खोल पा रहे थे। यह देखकर उन्होंने सोचा के यह क्या हो रहा है। मुझसे अच्छा तो यह जानवर है जो मुझसे मार खाने के बाद भी आगे नहीं बढ़ रहा है। और मैं बुरी भावना के साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। लानत है मुझ पर! अपने होश में आ अब्दुल रहमान यह वही फकीर है जिन्होंने काबा में करिश्मा किया था। यह वही फकीर है जिसके चरणों में रुकनुद्दीन  गिर गया था।

अब्दुल रहमान अपना अभिमान त्याग के घोड़े से नीचे उतरा और गुरु जी के चरणों में अपना सिर झुका दिया। और बोला, ओ फकीर मेरा हाथ थाम लो, जब मेरे शिष्य यह बात सुने तो वह सभी यह बता सके कि उनके फकीर को खुदा का रास्ता मिल गया है। ओ सच्चे पातशाह आपने इस अरब की धरती पर यहां के लोगों को एक अल्लाह का रास्ता दिखाया है लेकिन मेरी झोली अभी भी खाली है। कृपा करके अपना आशीर्वाद मुझे दो।

गुरु जी ने अपने चरणों में गिरे अब्दुल रहमान को उठाया और कहा अब्दुल रहमान तुम्हारी अरदास भी अल्लाह के दरबार में कुबूल हुई । परंतु तुम अपने लोगों को यह कह कर आए हो कि तुम हमें जिंदा दफना दोगे और अब तुम मेरे चरणों में हो। तुम्हारे प्रति तुम्हारे लोगों का विश्वास कम रहा है यह देखकर वह तुम को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अब्दुल रहमान ने पीछे मुड़कर देखा सैकड़ों लोग पीछे खड़े थे और उसे घूर  कर देख रहे थे।

अब्दुल रहमान यह देखकर घबराया नहीं, वह बोला जब मैं आपकी शरण में हूं तो मुझे काहे का डर । उसने लोगों की तरफ देखा और कहा ओ मेरे अजीज ओ मेरे दोस्तों मुझे फकीर के चरणों में देखकर अचंभा मत करो। गुस्से में मत आओ मैं यह सब इन्हें परखने के बाद कर रहा हूं, मैं इन्हें पहचान चुका हूं। यह महज एक पीर नहीं, एक नबी है।मेरी आंखों से देखो, तुम्हें नजर आएगा  दोनों जहां के सच्चे पातशाह  यही है। मैं  तुम्हें विश्वास दिलाता हूं जहां से संसार शुरू होता है और जहां तक खत्म होता है, हर कोई इनके आगे अपना सर झुकाता है । तुम लोग भी आओ और इन के सम्मान में अपना सर झुकाऊं। मेरे परिवार के लोगों ने कई सालों से आपको अल्लाह का मार्ग दिखाया है। आज मेरे वह पूर्वज जिन्होंने आपको अल्लाह का मार्ग दिखाया था वह सभी मर चुके हैं, और एक दिन मैं भी मर जाऊंगा। परंतु श्री गुरु नानक देव जी मरण और जीवन से ऊपर है।

अब्दुल रहमान के इन शब्दों को सुनकर सभी गुरुजी के सामने नतमस्तक हो गए।अब्दुल रहमान अब रोज गुरु जी के सत्संग में आने लगे और सभी लोग करतार का नाम जपने लगे।

बगदाद में श्री गुरु नानक देव जी का नाम फैलता जा रहा था भारी भीड़ में लोग गुरु जी को सुनने आ रहे थे। वहीं पर एक पीर थे जिनका नाम बहलोल था।अभी सूर्य की किरण निकली भी नहीं थी कि वह अपने कुछ शिष्यों के साथ बैठे थे के अचानक वह खड़े हुए और बोले, मेरे दोस्तों खड़े हो जाओ हमें अल्लाह के बंदे से मिलने जाना है।


पीर बहलोल गुरुजी के स्थान की ओर जल्दी जल्दी चलने लगे और उनके पीछे उनकी शिष्य भी चल रहे थे।थोड़ी देर पश्चात वह कब्रिस्तान की और पहुंचे जहां गुरुजी लोगों को गुरबाणी सुना रहे थे । वहां पहुंचते ही बहलोल गुरु जी के चरणों में गिर गए, अपने पीर को गुरु जी के चरणों में गिरते देख पीर के शिष्य  भी गुरु जी के चरणों में गिर गए। पीर बहलोल बोले आप इस धरती पर अल्लाह का रूप हैं, कृपा करके आप इस धरती को आशीर्वाद दें, जो आपके दर्शनों के लिए बरसों से इंतजार कर रही थी।

गुरु जी बोले  मुझे तो यहां आना ही था तुम्हारे भाई अब्दुल रहमान का प्यार मुझे यहां खींच लाया है। पीर बहलोल बोला, आपकी दया और आशीर्वाद का बहुत-बहुत धन्यवाद और मुझे बहुत खुशी है कि अब्दुल रहमान अब आपका हो गया है। श्री गुरु नानक देव जी बोले, मेरा धन्यवाद मत करो मैं तो यहां इसी काम के लिए आया था। पीर बहलोल बोला, हजरात इस धरती पर आपने अपना कदम रखकर इसे पवित्र कर दिया है। यह धरती ऐसे पवित्र हो गई है मानो किसी ने इसे दूध से धो दिया हो। परंतु मैं कुछ कहना चाहता हूं मेरी इच्छा पूरी कर दो। गुरुजी बोले बहलोल यह धरती इंसान की इच्छाओं से भरी हुई है परंतु अगर हमें मोक्ष चाहिए तो हमें इन सभी इच्छाओं को त्यागना होगा। पीर बहलोल बोला लेकिन गुरु जी मेरी इच्छा के पीछे कोई लालच नहीं है।

गुरुजी बोले बताओ, तुम क्या चाहते हो ? पीर बहलोल बोले मैं चाहता हूं कि आप अपने पवित्र कदम मेरे घर में भी  रखें। गुरुजी बोले क्या तुम आजाद पक्षियों को पक्के मकानों में रखना चाहते हो ? पीर बहलोल बोला गुरुजी मैं महलों में नहीं रहता, मेरी तो छोटी सी एक कुटिया है। श्री गुरु नानक बोले ठीक है हम तुम्हारे साथ तुम्हारी कुटिया में चलेंगे।

गुरुजी बहलोल की कुटिया के फर्श पर बिछी चादर पर बैठ गए थी। पीर बहलोल ने गुरु जी से कहा कृपया मुझे बताएं रसूल कैसे हैं, पैगंबर कैसे हैं  ? गुरुजी बोले अपनी आंखों से देख लो पीर बहलोल ने अपनी आंखें बंद की, थोड़ी देर बाद पीर बहलोल ने आंखें खोली और गुरु जी से बोला कि गुरु जी मैं आपका धन्यवाद कैसे करूं, आपने सब कुछ मुझे आंखें  बंद करके ही दिखा दिया। मेरी अब एक अंतिम इच्छा और है कि आप भोजन मेरे घर में ही करें।

गुरुजी मुस्कुराए, गुरुजी की मुस्कुराहट को बहलोल ने हा समझा और उमर राजा नामक व्यक्ति को बुलाया और कहां उमर जाओ गुरुजी के लिए खाने का इंतजाम करो। गुरु जी उमर से कहा कि तुम शहर से सामान लेने जा रही हो पर याद रहे, उसी दुकानदार से सामान खरीदना जो इंसान हो। उमर ने इस बात को सुन  लिया और गुरु जी को प्रणाम कर जाने लगा परंतु गुरुजी ने उससे कहा कि याद रहे सामान उसी से लेना जो सच्चा इंसान हो। उमर गुरु जी के सामने हाथ जोड़कर बोला, गुरु जी आपने इस शहर में अपने पवित्र कदम रखे हैं। इस शहर में हर इंसान नेकी से जी रहा है, कोई भी गलत काम नहीं करता यहां तक की यहां के जानवर भी यही चाहते हैं कि उन्हें मोक्ष मिले। यह पीरों की धरती है इसलिए यहां कोई गलत नहीं है।

गुरु श्री नानक जी बोले, उमर तुम जो तुम कह रहे हो यह एक आधारहीन बात है एवं वह घमंड से कही गई है।हर इंसान अपना कर्म कर रहा है। हम कैसा कर्म कर रहे हैं यह हम जानते हैं, पर सभी की जिम्मेदारी खुद ले लेना सही नहीं है। जैसे ही उम्र में अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश की, तभी गुरुजी ने अपने बालों में कंघी चलाई और बालों के दो गुच्छे  बनाए और उमर से पूछा कि यह क्या है। उम्र बोला कि यह बाल है और क्या है। गुरुजी बोले, तुम्हें लोगों को इन के माध्यम से देखना है।कुछ भी खरीदने से पहले दुकानदार को उनकी इनकी नजरों से ही देखना है  तुम्हें तभी सौदा खरीदना है।  जब दुकानदार इंसान हो और सामान खरीदने के बाद यह सिक्का उस इंसान को दे देना। उमर ने दोनों चीजों को संभाल कर रखा और सौदा खरीदने शहर की ओर निकल गया।

उमर पहली दुकान पर पहुंचा उमर ने दुकानदार को बालों के माध्यम से देखा। परंतु उमर यह देख अचंभे में पड़ गया कि वह दुकानदार हिरण के रूप में दिखने लगा, वह दूसरी दुकान पर पहुंचा परंतु जब उसने उस दुकानदार को गुरुजी के बालों के माध्यम से देखा वह उसे मुर्गी दिखने लगा उमर कई दुकानों पर गया परंतु सभी जगह ऐसा ही हुआ। उमर ने सोचा कि गुरु जी सही कह रहे थे कि हम सभी को एक नजर से नहीं देख सकते हैं।जो लोग यह मानते हैं कि हम पीरों के शहर में रह रहे हैं और उनका आशीर्वाद हमारे सर पर है और हमें मोक्ष मिलेगा, यह बात गलत है। यहां के अधिकतर लोग जीवन मरण के खेल में अपने आपको पशु पाएंगे। मेरे साथ क्या होगा, मैं तो यह सोचता था कि मैं पीर के साथ रह रहा हूं। मुझे मोक्ष मिलेगा। परंतु अब मेरे साथ क्या होगा।

 उमर अगली दुकान पर पहुंचा उसने गौर से उस आदमी को बालों के माध्यम से देखा, या खुदा आखिर मुझे इंसान मिल गया। भाई यह लो यह सिक्का और मुझे खाने का सामान दे दो। दुकानदार ने सिक्के को माथे से लगाया और बहुत सारा खाने का समान उमर को दे दिया। उमर ने दुकानदार से कहा, भाईजान मुझे लगता है कि आपने गलती की है। मैंने तो आपको सिर्फ एक ही सिक्का दिया है और आपने मुझे इतना सारा सामान दे दिया। दुकानदार बोला भाईजान यह सामान इस सिक्के की कीमत नहीं है। यह सिक्का तो अनमोल है। यह सामान तो मैं आपको इसलिए दे रहा हूं कि आपने मुझे इस सिक्के को हाथ में लेने का मौका दिया है।

उमर ने उस दुकानदार के पांव पकड़ लिए, और उनसे कहा, आप अल्लाह के बंदे दिखते हो मैंने मोक्ष प्राप्त करने के लिए अपने पीर का हाथ पकड़ा है। कृपया आप मुझे बताएं कि मुझे मोक्ष मिलेगा या मेरा हाल भी उन लोगों के जैसा होगा, जैसा कि मैंने आज लोगों का देखा है। दुकानदार ने अपना हाथ उमर को शीशे की तरह दिखाया।

उमर अपने आप को कुत्ते की योनि में देखकर कांपने लगा। उमर उस दुकानदार के पैरों में गिर गया और बोला औ अल्लाह के बंदे मुझे सही राह दिखाओ ताकि मुझे अगला जन्म पशु का ना मिले।

इंसान को पशु की योनि देना और पशु को इंसान की योनि देना मेरा कर्म नहीं है यह मेरे बस की बात नहीं है। उमर बोला तो यह कौन कर सकता है ? वही जिन्होंने तुम्हें मेरे पास भेजा है। यह सुनते ही उमर गुरु की जी की तरफ दौड़ा, दौड़ते हुए वह बोल रहा था श्री गुरु नानक देव जी महान फकीर है। जो श्री गुरु नानक को नहीं मानता वह नरक में जाएगा। बहलोल और उमर ने गुरुजी के चरण पकड़ लिए। बहलोल ने गुरु जी के सम्मान में एक तीर्थस्थान बनवाया । इसी इमारत के सामने एक पत्थर की शिला है जिस पर लिखा है गुरु शब्द का अर्थ अरेबिक भाषा के अनुसार रब है जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जो संसार का पालन पोषण करें और मुराद अली का अर्थ है, जो सभी की मुरादों को जो पूरा करें। इस शिला पर जो लिखा गया है वह अरबिक भाषा और तरकीश् भाषा को मिलाकर लिखा गया है। जिसका अर्थ कई विद्वानों ने निकालने की कोशिश की है। और जो तारीख किस पर लिखी है वह है 26 दिसंबर 1511 प्रथम विश्व युद्ध में सिख सिपाहियों ने बगदाद में इस स्थान पर एक कमरा बनवाया।  विश्व युद्ध के पश्चात बहुत से सिख सेना से निकलकर बगदाद में चले गए और वहां अपना निवास स्थान बनाया। सिखों ने वहां पर गुरुद्वारा बनाया और उस शिला को मुख्य द्वार पर रखा गया। गुरुद्वारे के साथ ही पीर बहलोल का भी मकबरा है जिसके दर्शन सिख् संगत आदर के साथ करने जाती है। बहलोल के गुरु जी के सिख बन जाने के कारण सारा वातावरण गुरुजी में ढल चुका था।

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