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बाबा श्री चंद के बचपन की कहानी

बाबा श्री चंद के बचपन की कहानी

बाबा श्रीचंद जी लगभग सात वर्षों के थे, जब श्री गुरु नानक देव जी जगत उद्धार के लिए अपनी पहली उदासी पर चले गए थे।जाने से पहले श्री गुरु नानक देव जी ने बाबा श्रीचंद जी को अपनी बहन बेबे नानकी की  झोली में डाल दिया, क्योंकि बेबे नानकी की झोली संतान सुख से खाली थी। बाबा लक्ष्मी दास जी अभी छोटे थे इसलिए वह अपनी माता सुलखनी जी के साथ अपने ननिहाल चले गए थे। बचपन से ही बाबा श्रीचंद जी चौकड़ी मारकर समाधि में लीन रहते थे बिल्कुल अपने पिता श्री गुरु नानक देव जी की तरह। एक तरफ हम उम्र बच्चे खेल रहे होते थे और दूसरी और वह समाधि में लीन होते थे।कभी समाधि लेते लेते तो कभी बैठे बैठे लुप्त हो जाते थे।

बालक का यह चमत्कार देखकर सभी हैरान हो जाते थे। एक दिन एक आदमी बेबे नानकी और जयराम जी के पास आया और बोला, जयराम जी जल्दी चलिए श्रीचंद घने जंगलों में जंगली जानवरों के बीच में बैठा हुआ है। यह बात सुनते ही सभी जंगल की ओर दौड़े, परंतु जब सभी ने देखा के शेर चीता बघेली हाथी और सांप बाबा श्रीचंद के चारों तरफ इस तरह बैठे हो, मानो तपस्वी बालक की रक्षा कर रहे हो और प्रभु नाम  के रंग में रंग गए हो।

जो जानवर एक दूसरे जीवो को देखते हैं मारने के लिए भागते थे, वह सभी बाबा की भक्ति में प्रेममय में हो गए थे। और बिना किसी को नुकसान पहुंचाए बाबा श्री चंद के सुंदर मुखड़े को  निहार रहे थे। सभी लोग यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। लोगों ने बेबे नानकी और भाई जयराम से कहा, यह बालक अद्भुत शक्तियों का स्वामी है। इसके  पास बैठकर इतने बलशाली और जहरीले जानवर इस तरह बैठे हैं कि मानो इस बालक को कोई कुछ भी नहीं कह सकता'। आप लोगों को इस बालक के लिए चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं है। आप निश्चित होकर घर जा सकते हो।

बेबे नानकी तो पहले से ही समझती थी यह बालक कोई दिव्य बालक है।परंतु यह दृश्य देखकर सभी संदेह समाप्त हो गए थे।  बेबे नानकी जान चुकी थी के उनका भतीजा कोई अवतारी बालक है और वह मन में सोचने लगी कि अकेले  बैठकर अपने मन की बातें करूंगी।दूसरे दिन सुबह बेबे नानकी अपने भतीजे अंतर्यामी बाबा श्री चंद जी के पास पहुंची तो बाबा श्री चंद बिना कुछ सुने अपनी बुआ से बोले बुआ, आपने मुझसे मन की क्या बात करनी है। अंतर्यामी भतीजे को देखकर बुआ खुशी से फूली न समाई और उसे अपने गले से लगा लिया। इतने में गांव के और लोग भी आ गए और बाबा श्री चंद जी के चरणों में अपना शीश झुका कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

बाबा श्री चंद सभी से बोले संसार के सभी पदार्थ झूठे हैं और वह दुख का दूसरा रूप है। संसार का मोह  दुखों का घर है। माया नागिन है और इसका डंक जिसको लगेगा उसका बचना नामुमकिन है इसलिए हमने सांसारिक पदार्थों को त्याग कर, घर बार छोड़ दिया है। मेरे लिए पूरा संसार ही मेरा घर है। इस संसार में रहने वाले सभी प्राणी मेरा परिवार हैं और सभी बहुत ही दुखी हैं। और मुझे सभी के दुख दूर करने हैं। आप हमेशा धर्म की कमाई करो, हमेशा सत्य बोलो, सेवा करो तभी लोक परलोक सफल होगा। हमारे हिस्से में अभी बहुत काम है यह बात कह कर बाबा श्री चंद जंगलों की ओर चले गए।

अब इन शब्दों से यह बात निकल कर आती है कि बाबा श्री चंद ने अपने परिवार से ऊपर उठकर पूरे संसार को अपना परिवार माना और सभी की भलाई के लिए कार्य किए। दूसरी ओर की गुरु नानक देव जी ने परिवार में रहते हुए ईश्वर को पाने का मार्ग बताया क्योंकि 99% लोग परिवार नहीं छोड़ सकते। और छोड़े भी कैसे गृहस्थ  जीवन से ही तो पीढ़ी और संसार आगे बढ़ेगा। पिता और पुत्र के रास्ते अलग थे परंतु मंजिल एक थी यानी ईश्वर को पाना।  मोह माया को त्यागना और लोगों की भलाई करना बाबा श्री चंद जी को उदासियों का स्वामी कहा जाता है।

उदासी शब्द का जन्म उदास से हुआ है यानी जो व्यक्ति दुनियादारी से उदास हो और जिसे बाहरी दुनिया, लोग दिखावे का कोई फर्क ना पड़े। श्री गुरु नानक देव जी की चार यात्राओं को भी उदासी के नाम से ही जाना जाता है। क्योंकि उस समय उन्होंने अपना घर बार छोड़ दिया था। लोगों में ज्ञान का प्रकाश चारों तरफ फैला कर जब अपनी उदासियां से वापस आए।तब उन्होंने लोगों को यह सिखाया कि किस तरह परिवार में रहकर भी परमात्मा को पाया जा सकता है

परंतु बाबा श्री चंद जी ने अपनी पूरी जिंदगी ब्रहमचारी रहते हुए उदासी संप्रदाय को मजबूत करने और फैलाने में गुजार थी।बाबा श्री चंद जी ने आरंभिक शिक्षा पंडित हरदयाल जी से प्राप्त की और उसके पश्चात वह माता नानकी के पास रहे। बाबा जी हमेशा एकांत पसंद करते थे और ध्यान में मगन रहते थे यह देखकर दादा कालू सोचने लगे। श्रीचंद सारा समय वैराग में रहता है, ध्यान में रहता है जैसे कि नानक रहता था। दादा कालू ने सोचा कि अच्छा यही होगा कि इसे पंडित पुरुषोत्तम जी के पास विद्या प्राप्ति के लिए कश्मीर भेज दिया जाए।

कश्मीर में ही ज्ञानी पंडित सोमनाथ त्रिपाठी रहते थे। उन्होंने कई विद्वानों को शास्त्र विद्या में हराया था, जिस वजह से उनमें अभिमान बढ़ गया था।परंतु बाबा श्री चंद जी ने उन्हें शास्त्रों के वाद-विवाद में पराजित किया। बाबा श्री चंद जी ने काबुल, सिंध हैदराबाद चंबा कश्मीर अफगानिस्तान और दूर दूर जाकर कोतुक या चमत्कार दिखाए। उन्होंने जीवन भर कोई कुटिया नहीं बनाई और अपने लगभग 150 वर्षों के जीवन काल में ब्रह्मचारी रहे।  

शिक्षा : दोस्तों अगर हम परमात्मा को पाना चाहते हैं तो हमें अपने अंदर से मोह माया को निकालना होगा क्योंकि क्योंकि बिना इनको निकाले हम कभी भी परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते। मोह माया हमारे अंदर से इतनी आसानी से नहीं जाती। मोह माया को अपने अंदर खत्म करने का एक ही तरीका है वह है सिमरन।


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